राष्ट्रीयकरण के तुरन्त बाद का दौर बैंक कर्मचारियों के लिये स्वर्णयुग कहा जा सकता है। समाज में आदर अच्छे वेतनमान तथा सरकार का कम हस्तक्षेप। लेकिन एक मीठे सपने की तरह शीघ्र ही सब कुछ लुप्त हो गया। अभी हाल के कुछ वर्षो में, बैंक की नौकरियों के प्रति जनसाधारण का मोह भंग हुआ है। आज बैंक कर्मचारियों के वेतनमान उद्योग के बहुत अच्छे वेतनमान नही कहे जा सकते। सरकार तथा प्रबंधतंत्र का कामकाज में हस्तक्षेप बढ गया है, कर्मचारियों को देर तक बैठना पडता है तथा जिम्मेंदारियां बढ गयीं है। इसिलिये कोई आश्चर्य नही कि आज बैंक उद्योग अच्छे कुशल कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है।
सरकारी, सूचना तकनीक तथा अन्य निजी क्षेत्रों के प्रति प्रतिभावान युवाओं के रूझान को देखते हुए बैंकों को अपना कार्यकारी घटक ग्रामों तथा छोटे शहर से चुनना पडेगा। आज बेरोजगारों की संख्या को देखते हुए कागजी आवेदन पत्र मंगवाना हानिकर सिद्ध हो रहा है इन्टरनेट के युग में अब बैंक आन लाइन आवेदनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। राष्ट्रीयकृत तथा अन्य निजी बैंक अब हिन्दी में भी परीक्षाओं का आयोजन करते हैं। हिन्दी भाषा में होने के कारण "बैंक समाचार" की ग्रामीण तथा अर्धशहरी इलाकों में अच्छी पैठ है। न केवल यह रिक्तियों की सूचना एक लम्बे चौडे हिन्दी भाषा वर्ग में फैला सकता हैं इसके अतिरिक्त इसका प्रबन्धन सेवा निवृत वरिष्ठ बैंक अधिकारियों के हाथ में होने से यह पारदर्शी तरीके से आन लाइन आवेदनो को प्राप्त करके बैंको के निर्देशानुसार लिखित परीक्षा के रोल नम्बर आंबटन तक का कार्य कर सकता है।
बैंक जहां रिक्तियों के आवेदन पत्र संग्रहण करने तथा रोल नम्बर आंबटन का कार्य हमें सौंपकर अपने मुख्य कार्य बैंकिग पर ध्यान दे सकते हैं इस वेबसाइट के पब्लिक डोमेंन में होने के कारण कोई भी इस कार्य में पारदर्शिता पर प्रश्न चिन्ह नही लगा सकता। इसके अतिरिक्त विशेषज्ञों के हाथ में होने से बैंको को इस कार्य में खर्च भी कम आयेगा।
आशा है कि बैंक हमारी इन सेवाओं का अधिकाधिक लाभ-उठायेंगे।